सोच-सामाजिक स्थिति-क्रांति का नजरिया
"जनता के प्रतिनिधित्व का कर्मभार अमीरों को सौंप दिया गया हैं ... गरीबों और शोषितों की दशा केबल शांतिपूर्ण तरीके से कभी नहीं सुधर सकती। यह इस बात का अकाटय प्रमाण है की धनाढ्य वर्ग कानून को कैसे प्रभावित करता हैं। फिर भि यह कानून तभी तक चलेंगे जब तक लोग इन्हे मानेंगे। जिस तरह उन्होने कुलीनों द्वारा लादे गए जुए को उतार फेंका हैं एक दिन वही हश्र अमीरों का करेंगे।"
समाचारपत्र 'लामी द पल्प' से उद्धृत
यह टिपन्नी विख्यात क्रांतिकारी पत्रकार 'ज्यां - पॉल मरा' द्वारा की गयी थी। दौर था फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात 'नेशनल असेंबली' द्वारा बनाए गए संविधान निर्माण के तुरंत बाद का। इस टिप्पणी के पीछे के कारण मताधिकार, निर्वाचक तथा असेंबली सदस्यता के संदर्भ मैं हैं।
जब फ्रांस मे फ़ांसीसी क्रांति के बाद नेशनल असेंबली द्वारा संबिधान के कानून बनाए गए तब उसमे एक महत्वपूर्ण पहलू ऐसा भी रखा गया की 'निर्वाचक की योग्यता तथा असेंबली सदस्यता तब प्राप्त किया जा सकता हैं जब वह व्यक्ति करदाताओं की उच्यतम श्रेणी मैं आये'। इसके अर्थ को थोड़ा बारीकियों से समझे तो यह दिखाई देता हैं की एक विशाल क्रांति के माध्यम से एक बिसेश वर्ग के हात से सत्ता को छीना गया और उसके पश्चात उससे तुलनात्मक रूप से एक बड़ा वर्ग के हात मे रख दिया गया। वंचित श्रेणी पहले से रहनेवाले वही परिस्थिति मे रह गया, परिवर्तन बस कुछ राजनीतिक पहलू का हुया जिससे इस वर्ग का लाभ बोहुत कुछ नहीं हुया।
इस परिस्थिति के बिशलेशन के साथ साथ ही वर्तमान भारत की कुछ स्थितियों से पुनः रूबरू हो जा रहा हूँ और सोचने के लिए बाध्य भी।
भारत की लोकतंत्र की बात किया जाए तो कुछ अहम सवाल मन मे आता हैं जैसे की आजादी के बाद जब संविधान सभा मे भारत के सबसे दबे-कुचले, दरिद्र श्रेणी के लिए इतने बात किए गए उसका हुया क्या और वर्तमान मे भी वह कहाँ हैं? धरतलीय सतह मैं तो नहीं। हम यह देखते हैं की किसी खास समूह को प्रस्तुत करने वाला बिधायक भी अपनत्व खो बैठता हैं जब वह बिधायक बन जाते हैं। वह उस समूह के जिस मुद्दे के साथ, जिस मुद्दे को लेकर उस स्थिति मे आते हैं उसी स्थिति प्राप्त करने के बाद वह मौलिक मुद्दे उनके सामने बोहुत फीका पड़ जाता हैं। होता बस यह हैं की वह समूह के समस्या वही रहा जाता हैं और तफ़रार से चलने वाले दिखावे की बिकास के पिछे उतने रफ्तार से ही वह पीछे पड़े रह जाते हैं वह समूह वह समस्या।
बोहुत सारे समय सुनने को मिलता हैं यह नेता बोहुत साधारण जीवन जीते हैं। सवाल तब मन मे आते हैं किस पैमाने मे साधारण? क्या उस पैमाना का निर्धारण उस वक्ती के संदर्भ मे होता हैं जो एक दिन अपने काम पर ना जाए तो उसके परिवार को भूखा सोना पड़ता हैं, यह फिर उस वक्ती के संदर्भ मे होता हैं जिसे छोटे शारीरिक समस्या का इलाज के लिए भी 15 से 20 km की कठिन रास्ता का सफर तय करना पड़ता हैं। यह सवाल यह आ जाता हैं की हम कुछ वक्ती/समूह के लिए पैमाना उपरे क्रम से करते हैं और वही पैमाना निर्धारण करने की प्रक्रिया मे 360 डिग्री का बदलाव हो जाता हैं जब वह वक्ती/समूह बादल जाता हैं।
आज tv, यह कुछ संचार माध्यम मे झांक कर देखना नहीं पड़ता digitalization अपने से ही कुंदकर सामने आ पड़ती हैं और वही स्थिति मे आप झांक कर देखिये बच्चों की एक बड़ा समूह मिलेगा जो सेलफोन- इंटरनेट की अभाव से अपने पड़ाई छोड़ने मे बाध्य हैं।
इन सारे स्थितियों के बीच भी सब कुछ जैसे रुका हुया सा हैं, पता नहीं कब हमारे जनता, आम-नागरिक को जाँ पॉल मरा की बात का अहसास होगी।
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