सोच-सामाजिक स्थिति-क्रांति का नजरिया
"जनता के प्रतिनिधित्व का कर्मभार अमीरों को सौंप दिया गया हैं ... गरीबों और शोषितों की दशा केबल शांतिपूर्ण तरीके से कभी नहीं सुधर सकती। यह इस बात का अकाटय प्रमाण है की धनाढ्य वर्ग कानून को कैसे प्रभावित करता हैं। फिर भि यह कानून तभी तक चलेंगे जब तक लोग इन्हे मानेंगे। जिस तरह उन्होने कुलीनों द्वारा लादे गए जुए को उतार फेंका हैं एक दिन वही हश्र अमीरों का करेंगे।" समाचारपत्र 'लामी द पल्प' से उद्धृत यह टिपन्नी विख्यात क्रांतिकारी पत्रकार 'ज्यां - पॉल मरा' द्वारा की गयी थी। दौर था फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात 'नेशनल असेंबली' द्वारा बनाए गए संविधान निर्माण के तुरंत बाद का। इस टिप्पणी के पीछे के कारण मताधिकार, निर्वाचक तथा असेंबली सदस्यता के संदर्भ मैं हैं। Jean Paul Marat, source- wikipedia जब फ्रांस मे फ़ांसीसी क्रांति के बाद नेशनल असेंबली द्वारा संबिधान के कानून बनाए गए तब उसमे एक महत्वपूर्ण पहलू ऐसा भी रखा गया की 'निर्वाचक की योग्यता तथा असेंबली सदस्यता तब प्राप्त किया जा सकता हैं जब वह व्यक्ति करदाताओं की उच्यतम श्रेणी मैं आये'। ...